स्वास्थ्य समस्याएं एवं बचाव

      
स्वास्थ्य समस्याएं एवं बचाव

1. एनीमिया

एनीमिया मुख्यत: आयरन की कमी से ज्यादातर स्त्रियों में होने वाली एक ऐसी बीमारी है, जिसमें हमारे शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा घट जाती है।

कारण

1. आमतौर पर स्त्रियां अपने खानपान को लेकर लापरवाह होती हैं। ऐसे में उनके शरीर में आयरन और फॉलिक एसिड की कमी हो जाती है, जिससे वे एनीमिया की शिकार हो जाती हैं।

2. चोट लगने, सर्जरी या पीरियड में ज्यादा ब्लीडिंग से यह समस्या हो सकती है।

3. गर्भावस्था के दौरान अगर आयरन और फॉलिक एसिड का पर्याप्त मात्रा में सेवन न किया जाए तो स्त्रियों में एनीमिया होने का खतरा खास तौर से बढ जाता है।

लक्षण

1. सिरदर्द और थकान महसूस करना

2. अकसर नींद आना

3. चक्कर आना और आंखों के आगे अंधेरा छाना

4. हृदय गति का असामान्य होना

5. कभी-कभी बेहोशी का दौरा पडना

6. भोजन के प्रति अरुचि

7. नाखूनों की रंगत सफेद

8. आंखों के नीचे काले घेरे पडना

बचाव

1. संतुलित और पौष्टिक आहार लें

2. आयरन युक्त खाद्य पदार्थो जैसे-हरी पत्तेदार सब्जियों, फलों और अन्य खाद्य पदार्थो जैसे- रेड मीट, चुकंदर, आंवला, गाजर, सेब, अनार, खजूर, मूंगफली, गुड और सूखे मेवों का सेवन करें।

3. शरीर में फॉलिक एसिड की मात्रा बढाने के लिए कुटू का आटा, ओटमील (जौ), गोभी, मशरूम, ब्रोकली, शहद और एस्पेरेगस खाएं।

4. लोहे की कडाही में सब्जियां पकाएं

5. कैल्शियम और विटमिन सी के लिए दूध, दही, पनीर, चीज के अलावा संतरा, नीबू, मौसमी, चकोतरा और अंगूर जैसे विटमिन सी युक्त फलों का आवश्यक रूप से सेवन करें।

6. डॉक्टर की सलाह पर आयरन और फॉलिक एसिड की गोलियां लें।

7. साल में एक बार अपना हीमोग्लोबिन टेस्ट जरूर करवाएं।

2. ऑस्टिओपरोसिस

अब तक वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध से यह प्रमाणित हो चुका है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को यह समस्या अधिक होती है। स्त्रियों में प्राय: चालीस वर्ष की उम्र के बाद इस समस्या के लक्षण देखने को मिलते हैं।

लक्षण

1. मोटापा

2. उच्च रक्तचाप

3. मेनोपॉज

4. ऊंची एडी के फुटवेयर

5. कै ल्शियम की कमी

लक्षण

1. जोडों में दर्द

2. जोडों में जकडन

3. सूजन

4. चलने, सीढियां चढने, पालथी मार कर जमीन पर बैठने और बैठकर उठने में दर्द और असुविधा महसूस होना

5. चलते समय जोडों से चट-चट की आवाज सुनाई देना

6. मांसपेशियों का कमजोर होना और खडे होते या चलते समय पैरों का असामान्य दिखाई देना। बचाव

1. अपने भोजन में कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थो जैसे- दूध, दही और पनीर आदि दुग्ध उत्पादों को अपने रोजाना के भोजन में जरूर शामिल करें।

2. अंडा, मछली, चिकेन और सफेद रंग के फलों और सब्जियों में भी पर्याप्त मात्रा में कैल्शियम पाया जाता है।

3. डॉक्टर की सलाह पर प्रतिदिन कैल्शियम की गोलियों का सेवन करें।

4. थोडी देर हल्की धूप का सेवन करें, सूर्य की रोशनी में मौजूद विटमिन डी शरीर में कैल्शियम के अवशोषण की क्षमता को बढाता है। 5. नियमित रूप से एक्सरसाइज करें और अपना वजन नियंत्रित रखें।

3. सर्विक्स कैंसर

भारत में ज्यादातर स्त्रियां सर्विक्स कैंसर की शिकार होती हैं। यह कैंसर स्त्रियों के गर्भाशय से संबंधित होता है। स्त्रियों को होने वाले कैंसर में लगभग 40 प्रतिशत मामले सर्विक्स कैंसर के ही होते हैं।

कारण

1. व्यक्तिगत सफाई पर ध्यान न देना

2. कम उम्र में विवाह

3. अधिक बच्चे या बार-बार गर्भपात होना

4. धूम्रपान

5. बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन

4. सहवास के दौरान यौन संक्रमण

लक्षण

1. पीरियड्स के अलावा अचानक कभी भी ब्लीडिंग

2. वजाइना से सफेद स्त्राव

3. पेट के निचले हिस्से में दर्द

4. सहवास के दौरान ब्लीडिंग

अगर इनमें से कोई भी लक्षण दिखाई दे तो बिना देर किए किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लें।

बचाव

1. व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखें, हमेशा अच्छी क्वालिटी का सैनिटरी पैड और सहवास के दौरान कॉण्डम का इस्तेमाल।

2. अब तक किए गए अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि विटमिन ए की कमी से सर्विक्स कैंसर होने का खतरा रहता है। इसलिए अपने भोजन में विटमिन ए युक्त खाद्य पदार्थो जैसे गाजर, चुकंदर, पपीता, आम आदि जरूर शामिल करें।

3. स्त्री रोग विशेषज्ञ से नियमित रूप से जांच कराती रहें।

4. अब सर्विक्स कैंसर से बचाव के टीके भी उपलब्ध हैं। हालांकि इसकी शत-प्रतिशत सफलता का दावा नहीं किया जा सकता। फिर भी एहतियात के तौर पर आप टीके लगवा सकती हैं।

4. थायरॉयड

थायरॉयड ग्रंथि हमारी गर्दन के निचले हिस्से में स्थित होती है और इससे एक खास तरह के हॉर्मोन टी 3 और टी 4 का स्त्राव होता है, जिसकी मात्रा के असंतुलन का स्त्रियों की सेहत पर प्रतिकूल असर पडता है।

लक्षण

1. हृदय गति का धीमा या तेज होना

2. हाथों-पैरों का ठंडा रहना

3. त्वचा एवं बालों का खुश्क होना

4. बालों का झडना

5. तेजी से वजन बढना या घटना

6. कब्ज

7. आंखों के चारों ओर सूजन

8. आवाज में भारीपन

9. शारीरिक एवं मानसिक थकान

10. पीरियड से संबंधित अनियमितताएं

11. गर्मी सहन न कर पाना

12. अधिक पसीना निकलना

13. व्यवहार में चिडचिडापन

14. आंखों के सफेद हिस्से का सामान्य से अधिक उभर जाना

उपचार एवं बचाव

निम्नलिखित जांचों द्वारा थायरॉयड ग्रंथि से संबंधित विभिन्न समस्याओं की पहचान की जाती है :

1. सीरम टीएसएच

2. रक्त में टी3 एवं टी4 हॉर्मोस का स्तर

3. फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी

4. थायरॉयड ऑटो-एंटीबॉडीज

5. आइसोटोप स्कैनिंग

6. एमआरआई, सीटी स्कैन अथवा सोनोग्राफी से बीमारी की पहचान की जाती है। अगर आपको थायरॉयड के उपयुक्त लक्षणों में से कोई भी लक्षण दिखाई तो एंडोक्रनोलॉजिस्ट से सलाह लें।

इस समस्या से पीडित स्त्रियां सामान्य जीवन व्यतीत कर सकती हैं। लेकिन उनके लिए नियमित रूप से दवाओं का सेवन करना बहुत जरूरी होता है और डॉक्टर की सलाह अनुसार समय-समय पर अपनी विस्तृत जांच करवाते हुए थायरॉयड ग्रंथि की तत्कालीन क्षमता को मापना अति आवश्यक है।

5. ओवेरियन सिस्ट

ओवेरियन सिस्ट की समस्या सभी स्त्रियों को उनके जीवनकाल में कभी न कभी जरूर प्रभावित करती है।

दरअसल ओवरी के भीतर द्रव्य से भरी थैलीनुमा संरचनाएं होती हैं। प्रतिमाह पीरियड के दौरान थैली के आकार की एक संरचना उभरती है, जो फॉलिकल के नाम से जानी जाती है। इन फॉलिकल्स से एस्ट्रोजेन और प्रोजेस्ट्रॉन नामक हॉर्मोस का स्त्राव होता है, जो ओवरी से मैच्योर एग की निकासी में सहायक होते हैं। कुछ मामलों में पीरियड की निश्चित अवधि खत्म हो जाने के बाद भी फॉलिकल का आकार बढता रहता है, जिसे ओवेरियन सिस्ट कहा जाता है।

कारण

1. आनुवंशिक प्रभाव

2. मोटापा

3. कम उम्र में पीरियड की शुरुआत

4. गर्भधारण में अक्षमता

5. हॉर्मोन्स का असंतुलन

लक्षण

1. पेट के निचले हिस्से में रुक-रुक कर दर्द और भारीपन महसूस होना

2. पीरियड का अनियमित और अधिक मात्रा में ब्लीडिंग होना

3. व्यायाम या सहवास के बाद पेल्विक क्षेत्र में दर्द महसूस होना

4. जी मिचलाना

5. वजाइना में दर्द

उपचार

सिस्ट का उपचार उसके आकार और लक्षणों की गंभीरता के आधार पर किया जाता है। आम तौर पर छोटे आकार वाले सिस्ट दो-तीन महीने के मासिक चक्र के बाद अपने आप दूर हो जाते हैं। लेकिन अगर सिस्ट दो या तीन महीने के बाद भी दूर नहीं होते या मेनोपॉज के बाद यह समस्या हो तो बिना देर किए कुशल स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलना चाहिए, अन्यथा यह सिस्ट कैंसर का रूप धारण कर सकता है। की होल सर्जरी और लैप्रोस्कोपिक सर्जरी द्वारा इस समस्या का उपचार संभव है।

6. ब्रेस्ट कैंसर

कैंसर का जो प्रकार सबसे ज्यादा स्त्रियों को प्रभावित करता है, वह है- स्तन कैंसर। इंडियन कैंसर सोसायटी द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक मुंबई के अस्पतालों में एक वर्ष के भीतर ब्रेस्ट कैंसर के 6,629 मामले दर्ज किए गए।

कारण

1. देर से विवाह या 30 वर्ष से अधिक उम्र में बच्चे को जन्म देना

2. कम उम्र में पीरियड की शुरुआत या देर से मेनोपॉज होना

3. खानपान के गलत तरीके से शरीर में अतिरिक्त फैट का जमा होना

4. आनुवंशिक कारण

बचाव

1. ब्रेस्ट के हर हिस्से का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करें और देखें कि उसमें कोई गांठ या सूजन तो नहीं है।

2. ध्यान से देखें कि स्तनों की संरचना और त्वचा की रंगत में कोई बदलाव तो नहीं दिखाई दे रहा। यह भी देखें कि कहीं धारियां तो नहीं हैं या दबाने पर कहीं गड्ढा तो नहीं पड जाता।

3. अगर कभी निप्पल्स में दर्द, खुजली या किसी तरह का डिस्चार्ज हो तो बिना देर किए डॉक्टर से सलाह लें।

4. अपनी उंगलियां सीधी रखें और उन्हें ब्रेस्ट के बाहरी दायरे से धीरे-धीरे घुमाते हुए निप्पल्स के आसपास के हिस्से तक ले जाएं। इस तरह स्पर्श से वैसी गांठ के बारे में भी पता चल जाएगा, जो खुली आंखों से दिखाई नहीं देती।

5. इसी तरीके से अंडरऑ‌र्म्स की भी जांच करें क्योंकि ब्रेस्ट कैंसर होने पर इस हिस्से में भी गांठ हो सकती है।

6. अगर आपके परिवार में पहले से किसी को यह बीमारी रही है तो तीस वर्ष की उम्र के बाद तीन वर्ष के अंतराल पर एक बार और चालीस के बाद साल में एक बार मेमोग्राफी जरूर कराएं।

7. वजाइनल यीस्ट इनफेक्शन

यह ऐसी स्वास्थ्य समस्या है जिसका सामना हर स्त्री को जीवन में कभी न कभी करना पडता है। मेडिकल साइंस के सर्वेक्षणों के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत स्त्रियां इस समस्या से ग्रस्त होती हैं।

लक्षण

1. वजाइना में खुजली

2. जलन

3. सफेद रंग का गाढा डिस्चार्ज

4. स्किन रैशेज

5. सूजन

6. बार-बार यूरिन आना और यूरिन डिस्चार्ज के समय दर्द

कारण

कैनिडिड एलबिकन्स फंगस से मिलता-जुलता एक तरह का यीस्ट होता है, जो वजाइना के मुंह पर स्थित होता है और सामान्य परिस्थितियों में यह शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। लेकिन नीचे दिए कारणों से यह सक्रिय हो उठता है और स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाता है :

1. ज्यादा एंटीबॉयोटिक दवाओं का सेवन

2. अनिद्रा

3. कुपोषण

4. नॉयलोन या लाइक्रा के थांग्स पहनना

5. गर्भावस्था में डायबिटीज

6. लगातार गर्भनिरोधक गोलियों और बहुत ज्यादा खट्टी चीजों का सेवन

बचाव एवं उपचार

1. व्यक्तिगत सफाई का ध्यान रखें

2. स्विमिंग के बाद बिना देर किए नहाकर कपडे बदलें

3. कॉटन के ढीले थांग्स पहनें

4. बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबॉयोटिक दवाएं न लें

5. अगर डायबिटीज है तो ब्लड शुगर के स्तर को नियंत्रित करने की कोशिश करें। अगर आपको वजाइनल फंगल इनफेक्शन हो भी जाए तो बिना देर किए किसी कुशल स्त्री रोग विशेषज्ञ से सलाह लें। सामान्यत: एक महीने के उपचार के बाद यह समस्या दूर हो जाती है।

8. यूरिनरि ट्रैक इनफेक्शन

यूरिनरी ट्रैक इनफेक्शन (यूटीआई) स्त्रियों में होने वाली सामान्य स्वास्थ्य समस्या है, जो उपचार के बाद प्राय: ठीक हो जाती है।

कारण

1. स्त्रियों की शारीरिक संरचना इस समस्या का सबसे बडा कारण है। बॉवल और वजाइना के पास होने के कारण बॉवल की त्वचा के आसपास मौजूद बैक्टीरिया यूरेथ्रा के रास्ते होते हुए, ब्लॉडर या यूरिनरी ट्रैक के दूसरे हिस्सों में पहुंच जाता है, जिससे यूटीआई की समस्या होती है।

2. सहवास के दौरान व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान न रखना भी इसका कारण है।

3. यूरिन के प्रेशर को बहुत देर तक रोक कर रखने से ब्लॉडर के मसल्स पर उनकी क्षमता से अधिक दबाव पडता है, जिससे वे कमजोर पड जाते हैं और यूटीआई की आशंका बढ जाती है।

4. गर्भावस्था और डायबिटीज

लक्षण

1. यूरिन डिसचार्ज करते समय दर्द और जलन महसूस होना

2. बार-बार टॉयलेट जाने की जरूरत महसूस होना

3. रुक-रुक यूरिन डिसचार्ज होना

4. यूरिन के साथ ब्लड आना

5. पेट के निचले हिस्से या कमर में दर्द

बचाव

1. व्यक्तिगत सफाई का ध्यान रखें

2. ज्यादा से ज्यादा पानी पीएं

3. मिर्च-मसालों का सेवन न करें

4. विटमिन सी में कई ऐसे तत्व होते हैं, जो यूटीआई फैलाने वाले बैक्टीरिया को नष्ट करने में सहायक होते हैं। अत: इस समस्या से बचने केलिए विटमिन सी युक्त फलों जैसे नीबू, संतरा, मौसमी आदि का सेवन करें।

5. हमेशा कॉटन के थॉन्ग्स पहनें।

6. इस बात का ध्यान रखें कि आपके घर का टॉयलेट हमेशा साफ रहे।

9. डिप्रेशन

यह प्रामाणिक सत्य है कि पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को यह समस्या ज्यादा प्रभावित करती है। इसके लिए स्त्रियों की शारीरिक संरचना और सामाजिक कारण जिम्मेदार होते हैं।

कारण

1. आनुवंशिकता

2. गर्भनिरोधक गोलियों का लगातार सेवन

3. बचपन की कोई दुखद घटना

4. सामाजिक सहयोग का अभाव

5. शिशु के जन्म के बाद अचानक आने वाली जिम्मेदारी का तनाव

लक्षण

1. गहरी उदासी

2. सामाजिक गतिविधियों में अरुचि

3. यौनेच्छा में कमी

4. निराशावादी और नकारात्मक सोच

5. सेहत के प्रति बेहद लापरवाही

6. अंधेरे में अकेले रहने की इच्छा

7. अनिद्रा या बहुत ज्यादा नींद आना

8. आत्महत्या की प्रवृत्ति

बचाव

1. खुद को किसी न किसी तरह के काम में, व्यस्त रखने की कोशिश करें।

2. अपने कमरे को आकर्षक ढंग से सजाएं, फूलदान में रोज ताजे सुगंधित फूल लगाएं, खुद भी हलके और उदास रंगों के बजाय शोख चटख रंगों वाले ड्रेसेज पहनें, अपना हेयर स्टाइल बदलें। फिर देखिए डिप्रेशन कहां टिकता है आपके पास।

3. उदासी भरे संगीत, साहित्य और फिल्मों से दूर ही रहें तो आपके लिए ज्यादा अच्छा होगा। रोमांटिक संगीत सुनें, बैडमिंटन खेलें, बच्चों के साथ कोई मस्ती भरा इंडोर गेम खेलें और कॉमेडी फिल्में देखें।

4. चाय-कॉफी, एल्कोहॉल और सिगरेट से दूर रहने की कोशिश करें।

5. अगर आपको यह समस्या है तो मनोचिकित्सक से परामर्श जरूर लें।

10. मेनोपॉज

मेनोपॉज के दौरान स्त्री के शरीर में हार्मोन संबंधी अनेक बदलाव आ रहे होते हैं, जिसका गहरा प्रभाव उसके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पडता है।

लक्षण

1. शरीर में तापमान में अनिश्चितता

2. कभी-कभी अचानक बुखार सा महसूस होना और पसीना आना

3. शरीर में एस्ट्रॉजन और प्रोजस्ट्रॉन नामक हॉर्मोन के निर्माण की प्रक्रिया भी धीमी पड जाती है। इससे यूटीआई, बार-बार यूरिन आना और खांसी के साथ यूरिन डिस्चार्ज जैसी समस्याएं होती हैं।

4. हृदय की धमनियों के संकुचित होने से हृदय रोग का खतरा

5. स्मरण शक्ति में कमी, चिडचिडापन और अनिद्रा

6. यौनेच्छा में कमी

7. त्वचा में रूखापन, बालों का झडना और अवांछित बालों की समस्या

बचाव

1. भोजन में गर्म और मसालेदार चीजों का इस्तेमाल न करें, ज्यादा पानी पीने की कोशिश करें, सूती कपडे पहनें।

2. भोजन में हरी सब्जियां, सलाद, अंकुरित अनाज, ताजे फल और जूस नियमित रूप से लें।

3. प्रतिदिन एक ग्लास दूध अवश्य लें क्योंकि इस दौरान कैल्शियम की कमी से हड्डियां कमजोर पडने लगती हैं।

4. ऐसा सोचना गलत है कि मेनोपॉज के बाद शरीर थक जाता है। डॉक्टर की सलाह के बाद आप नियमित रूप से ब्रिस्क वॉक, जॉगिंग, स्विमिंग, स्किपिंग, साइक्लिंग जैसे सभी व्यायाम बडी सहजता से कर सकती हैं।

(स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ.वारिजा एवं मनोविश्लेषक डॉ. सुजय दत्ता से की गई बातचीत पर आधारित)

विनीता
 
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