सत्ता के आकर्षण से दूर हैं सोनिया गांधी
सत्ता के आकर्षण से दूर हैं सोनिया गांधी

आप अवश्य सोनिया गांधी से मिलें और उन्हें उस कडवी सच्चाई की जानकारी दें, जो आपने गुजरात दंगों से पीडित लोगों के बीच काम करते हुए महसूस की। आपकी सीधी-खरी बातें उन पर कांग्रेसियों की सलाह से अधिक असर करेंगी।

14वीं लोकसभा चुनाव के ठीक पहले एक राष्ट्रवादी मुस्लिम पार्टी के नेता ने मुझसे कहा। भाजपा ने कांग्रेस को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ के चुनावों में हरा दिया था और इन राज्यों की जीत के उत्साह में भाजपा अप्रैल-मई 2004 में ही चुनाव की मांग कर रही थी। किसी राजनीतिज्ञ से मिलने में मेरी कभी कोई रुचि नहीं रही। मैं अराजनीतिक किस्म का व्यक्ति हूं। मुझे लग रहा था कि चौदहवीं लोकसभा का चुनाव देश के भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है। देश की जनता ने दक्षिणपंथी शक्तियों को सत्ता सौंपी थी, लेकिन उन्होंने धर्मनिरपेक्ष बुनावट को तार-तार कर दिया। गुजरात में जो कुछ हुआ, उसने हर भारतीय को शर्मिदा किया था। इस कारण मैंने वही किया, जो दिल ने कहा। मैंने फैसला किया कि मैं सोनिया गांधी से मिलूंगा और दिल की बात बताऊंगा। मुमकिन है देश के इतिहास में वे उस पन्ने को पलट सकें जो अभी अत्यंत मुश्किल काम लग रहा है।

बदलाव की प्रक्रिया

10 जनपथ में जाना मेरे लिए यादगार अनुभव रहेगा। मैं नहींजानता था कि जिस सोनिया गांधी से मिलने जा रहा हूं, वह बदलाव की प्रक्रिया से गुजर रही हैं। कांग्रेस पार्टी की अनिश्चित अध्यक्ष से सत्तारूढ पार्टी की निर्विरोध शक्तिशाली नेता के रूप में उनका परिवर्तन हो रहा था। एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के साथ सुरक्षा जांच से गुजरते हुए मैं महसूस कर रहा था कि मैं जहां जा रहा हूं, वहां देश का इतिहास बदला जा रहा है। प्रतीक्षागृह और गलियारे में देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की तसवीरें टंगी थीं। उस परिष्कृत संरचना के भीतरी हिस्से में विस्फोटक शांति थी। अचानक वह मुझसे रूबरू हुई। उन्होंने साडी पहनी हुई थी। कमरे में भरी सुबह की रोशनी उन्हें दिव्य आभा से सुशोभित कर रही थी। उनके रोम-रोम से गर्माहट छलक रही थी, लेकिन मैंने इसमें छिपी उदासी को भी महसूस किया। उन्होंने हेलो से शुरुआत की। उनके लिए यह अनौपचारिकता असामान्य बात थी। एकबारगी यहां तक पहुंचने की उनकी उल्लेखनीय यात्रा की झलक मेरे मानस में कौंध गई।

उत्तरी इटली में 9 दिसंबर 1946 को सोनिया मैनो का जन्म हुआ। पढाई में अच्छी थीं और नई भाषाएं जल्दी सीख लेती थीं। उनके जीवनीकार बताते हैं कि वे स्पेनिश, रूसी, फ्रांसीसी और अब हिंदी में भी बातचीत कर सकती हैं। आजकल वे अपने भाषण देवनागरी लिपि में ही पढती हैं। वे कहती हैं कि बचपन में नटखट थी मैं, घंटों हॉप-स्कॉच खेलती थीं और जब-तब लडकों के साथ फुटबाल खेलने में उन्हें मजा आता था। कैंब्रिज में इतालवी भोजन की खोज में वे किसी ग्रीक रेस्टरां में घुसीं, जहां राजीव गांधी से उनकी मुलाकात हुई। तब सोनिया ने सपने में भी अनुमान नहीं किया होगा कि भविष्य में क्या होने वाला है?

असहमति का भी सम्मान

चुनाव अभियान के सिलसिले में लगभग हर प्रदेश की आपकी अनगिनत यात्राओं ने हमारे अंदर जोश भर दिया। कट्टरपंथियों ने इस देश को जिस रसातल में ला दिया है, उसे वहां से निकालने की दृढता आपके भीतर दिखती है। आपकी ताकत के लिए मैं आपकी प्रशंसा करता हूं। ऐसा लग रहा है कि इस लडाई को आप अकेले लड रही हैं। मैंने पूरी ईमानदारी से अपनी राय रखी। मेरी बात सुनकर वे मुसकराई और फिर सच्चे नेता की तरह कहा, मैं अकेली नहीं हूं। पार्टी मेरे साथ है। आप जैसे धर्मनिरपेक्ष लोगों का सहयोग मेरे साथ है।

मैं आपकी पार्टी के बारे में एक सच बताने आया हूं। क्या आप जानती हैं कि गोधरा के शिकार लोग आपकी पार्टी से सहायता की कोई उम्मीद नहीं रखते। वे जब भी मुसीबत में फंसते हैं, मुझे या दूसरे एनजीओ के दोस्तों को मदद के लिए बुलाते हैं। गुजरात में कट्टरपंथियों के खिलाफ कडा रुख नहीं अपनाने से पार्टी का नुकसान हुआ है। लोगों का विश्वास घटा है। कुछ नेता मानते हैं कि गुजरात में मोदी से टकराना ठीक नहीं होगा, लेकिन जो बात नैतिक रूप से गलत है, वह राजनीतिक रूप से कैसे सही हो सकती है? मैंने सीधा सवाल किया। मेरे साथ गए वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मेरे सवाल से अवाक रह गए। मेरी नाराजगी को सोनिया समझ गई। मैंने अपनी बात जारी रखी, कांग्रेस या तो अपने बुनियादी मूल्यों की मिसाल बने और गांधी और नेहरू की तरह नि:स्वार्थ भाव से देश की सेवा करे या फिर आप नेतृत्व छोड दें। भ्रष्ट लोगों के लिए क्यों आप अपनी जिंदगी दांव पर लगा रही हैं? उन्हें पार्टी अध्यक्ष के रूप में आपके नेतृत्व पर संदेह है और अगर आप उन्हें जीत नहीं दिला सकीं तो वे आपको भी छोड देंगे? भावनात्मक रूप से विदग्ध होने के कारण उन्होंने मेरी ईमानदार चिंताओं की कद्र की। जब मैं जाने के लिए उठा तो वे मुझे छोडने दरवाजे तक आई। उन्होंने निश्छल भाव से कहा, आपने जो भी कहा मैं उससे सहमत हूं। धन्यवाद।

गरीब के साथ उनका हाथ

चुनाव लडने के लिए सोनिया गांधी के पास सिर्फ 22 करोड का बजट था, लेकिन उन्होंने नारा दिया, कांग्रेस का हाथ, गरीब के साथ। इस नारे ने चमत्कार कर दिया। उन्होंने चुनाव प्रचार में जनता से एक ही सवाल किया। उन्होंने कहा कि वे खुद परखें और देखें कि क्या वास्तव में भारत चमक रहा है? उन्होंने चुनाव-प्रचार के लिए लगभग 70 हजार किलोमीटर की यात्रा की। पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण पूरे देश की यात्रा उन्होंने की। उनके साथ कांग्रेस के नेता नहीं थे। यह अकेले व्यक्ति की अकेली राजनीतिक यात्रा थी। 12 मई, 2004 को जब देश सांसें थामे चुनाव नतीजों का इंतजार कर रहा था तो उनसे मिलने के लिए रिलायंस के अनिल अंबानी पहुंचे। हालांकि उसे औपचारिक मुलाकात कहा गया था, लेकिन 10 जनपथ से एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित भाजपा के हेडक्वार्टर में हलचल मच गई थी। देश के औद्योगिक घरानों में कानाफूसी होने लगी थी कि अनिल अंबानी का अनुमान कभी गलत नहीं होता। निश्चित ही सोनिया गांधी चुनाव जीतने जा रही हैं।

सत्ता का आकर्षण नहीं

13 मार्च, 2004 को चमत्कार हो गया। देश ने कांग्रेस के पक्ष में जनमत दिया था और लोग सोनिया जी के दफ्तर के आगे इस आग्रह के साथ कतार में खडे थे कि वे प्रधानमंत्री का पद स्वीकार कर लें। दिन गुजरने के साथ सोनिया गांधी के करीबियों को एहसास हो गया था कि उनकी खामोशी के पीछे गंभीर उथल-पुथल चल रही है। फिर भी किसी ने यह उम्मीद नहीं की थी कि वे देश के सबसे बडे पद से मुंह मोड लेंगी और प्रधानमंत्री का पद मनमोहन सिंह को सौंप देंगी। इस पद को न स्वीकार कर उन्होंने इतिहास रच दिया था। संसद भवन के केंद्रीय सभागार में सांसदों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, प्रधानमंत्री की कुर्सी मेरा लक्ष्य नहीं है। मैं हमेशा मानती रही हूं कि आज की स्थिति में पहुंचने पर मैं अपने अंदर से आती आवाज को तरजीह दूंगी। वह आवाज मुझसे कह रही है कि मैं यह पद ग्रहण न करूं। सत्ता ने मुझे कभी आकर्षित नहीं किया और प्रधानमंत्री का पद कभी मेरा लक्ष्य नहीं रहा। देश के धर्मनिरपेक्ष लोगों और गरीबों की रक्षा ही मेरा लक्ष्य रहा है।

ईमानदार नेता के गुण

यह नाटक है। सोनिया चाहती हैं कि उनके बेटे राहुल के प्रधानमंत्री बनने तक मनमोहन सिंह इस कुर्सी को बचाए रखें। एक वरिष्ठ पत्रकार ने मुझसे कहा था। लेकिन मुझे उनका ऐतिहासिक फैसला ईमानदार लगा। अपनी छोटी मुलाकात में मैंने महसूस किया था कि उनमें नि:स्वार्थ भाव है, जिसकी वजह से लोग किसी नेता से जुडते हैं। मैं अल्पसंख्यकों की किसी भी समस्या को लेकर उनके दरवाजे पर पूरे भरोसे के साथ दस्तक देता हूं।

देश में हुए बम विस्फोटों ने अल्पसंख्यकों, आम आदमी और सोनिया गांधी की जिंदगी मुश्किल कर दी है। ऐसे समय में उन्हें अपना वचन पूरा करना था। मुंबई में हुए भयंकर ट्रेन विस्फोट के अगले दिन मैं उनसे दिल्ली में मिला था। वे मुंबई से लौटी ही थीं। 40 मिनट की मुलाकात में मैंने देखा कि देश की हालत से वे परेशान थीं। उन्होंने कहा, मुसलमान इस देश के हाड-मांस की तरह हैं। मैं और मेरी पार्टी उनके संवैधानिक अधिकारों के लिए कुछ भी करेगी। भविष्य में उनसे संबंधित कोई भी मुद्दा मुझे बताने में आप न हिचकें। मैं उन पर खुद गौर करूंगी। जिस आत्मविश्वास के साथ उन्होंने यह बात कही, उससे लगा कि इस देश के प्रति उनका प्रेम किसी भारतीय से रत्ती भर भी कम नहीं है। हर बार मिलने के बाद मैंने पाया कि वे जो कहती हैं, उसे करती भी हैं। उनकी कथनी और करनी में फर्क नहीं है।

सच्चाई सुनने की हिम्मत

उनकी एक छवि मेरे दिमाग से नहीं उतर पाती है। 2006 में मुंबई की लोकल ट्रेन में हुए बम विस्फोटों के बाद मैं उनसे मिलने गया था। मेरे साथ देश भर के विभिन्न मुसलिम समुदायों के मौलाना थे। बातचीत के दौरान एक बुजुर्ग मौलाना ऊंची आवाज में बोलने लगे और किसी शिक्षक की तरह उन्होंने छडी उठा ली। सभी हैरान हो गए, लेकिन सोनिया गांधी की मुसकराहट ने सबको चुप कर दिया। उन्होंने मौलाना के प्रति आदर जाहिर किया, क्योंकि उन्होंने बेहिचक नाराजगी जाहिर की थी। चलते समय जब सभी धीमे स्वर में सोनिया जी से माफी मांग रहे थे तो उन्होंने कहा, ऐसे माहौल में भला वे और किसे डांटेंगे। मुझे खुशी है कि वे मुझ पर भरोसा करते हैं। तभी तो उन्होंने अपनी नाराजगी जताई।

ऐसी घटनाओं से ही लगता है कि भारत महान देश है। किस अन्य देश में अल्पसंख्यक अपने नेता को खुलकर अपने मनोभाव बता सकते हैं और उन्हें डांट सकते हैं? कुछ देशों में तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता। धन्यवाद सोनिया.. आपने महात्मा गांधी की विरासत में नई जान फूंक दी है।

महेश भट्ट
 
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