कैसा सच किसका सामना

      
कैसा सच किसका सामना

ब्राजील में पुलिस ने कत्ल के कुछ मामलों में एकटीवी चैनल के क्राइम शो के हॉस्ट पर संदेह जताया है। बकौल पुलिस वारदात को सबसे पहले दिखाने के लिए उसने खुद ही पांच कत्ल करवाए। उसे ड्रग्स के धंधे में भी संलिप्त बताया जाता है और वह सांसद भी है। हालांकि आरोपी वालेस सूजा के अनुसार यह सब झूठ है और उन्हें राजनीतिक विरोधियों द्वारा फंसाया जा रहा है।

ब्राजील की पुलिस और वालेस में से किसकी बात में कितना दम है, यह तो खैर समय बताएगा, लेकिन टीआरपी की अंधी दौड में चैनल जिस रास्ते पर चल पडे हैं वह किसी सही दिशा में जाता नहीं दिख रहा है। यह बात पश्चिम ही नहीं, भारत में टीवी की दुनिया पर भी उतनी ही तल्खी के साथ लागू होती है। बहुत दिन नहीं बीते जब यह खबर व्यापक चर्चा का विषय बनी-सच का सामना नहीं कर सका तो पति ने जान दी। खबर के मुताबिक जो कडवा सच उसके सामने आया उसके मूल में एक टीवी शो ही था।

सच की सार्थकता

वैसे सच को सामने लाना कोई गुनाह नहीं है। दर्शन व साहित्य से लेकर पत्रकारिता और सिनेमा तक अपने-अपने ढंग से यही करते रहे हैं और इसीलिए उन्हें सराहा भी जाता है। पर सराहा सिर्फ तभी तक जाता है, जब तक वे ऐसा सच सामने लाएं जो बहुजनहिताय और बहुजनसुखाय हो। धर्मशास्त्र भी यही कहते हैं कि अगर एक की बलि देने से एक हजार लोग सुखी होते हों तो वह बलि दे देनी चाहिए। कानून में भी अपराधियों के लिए मृत्युदंड तक इसीलिए नियत है ताकि समाज की मुख्यधारा सुखी रह सके, लेकिन सिर्फअपने स्वार्थ या अहंकार के लिए किसी को मामूली नुकसान पहुंचाना भी अपराध है। फिर ऐसा सच दुनिया के सामने ले आने का क्या मतलब, जिससे फायदा सिर्फ चैनल को टीआरपी का हो और टूटते तमाम घर हों? बात सिर्फ सच सामने आने की नहीं, असल सवाल समाज के लिए उसकी उपयोगिता का है।

सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार, राजनेताओं की फितरतें, नकली दवाओं का कारोबार.. ऐसी कितनी ही चीजें हैं जिनके लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की सक्षमता की भरपूर सराहना की गई। लेकिन किसी की निजी जिंदगी में ऐसी ताकझांक के लिए भारतीय समाज में कभी कोई जगह नहीं रही है जिससे व्यापक समाज का कोई हित न सधता हो। क्लिंटन और लेविंस्की का किस्सा अमेरिका में भले खूब बिका, पर नेहरू-एडविना के किस्से में रुचि लेने के लिए हिंदुस्तान में बहुत ज्यादा लोग नहीं मिले। फिल्मी सितारों की प्रेम कहानियां भी उतनी चर्चा का विषय नहीं हैं, जितना कि अपने काम में उनकी महारत। इसके जीवंत उदाहरण राजकपूर और नरगिस के रिश्ते रहे हैं, जिन्हें समाज ने खास तवज्जो नहीं दी। जबकि दोनों अपने समय के सबसे बडे सेलिब्रिटी थे।

अब मिली अहमियत

रिअलिटी शोज के विरुद्ध भी तब तक आवाजें नहीं उठीं, जब तक कि उनमें समाज के हितों पर कुठाराघात की आशंका नहीं दिखी। वह चाहे अमिताभ बच्चन की एंकरिंग वाला कौन बनेगा करोडपति हो, या सारेगामा या फिर नच बलिए। लॉफ्टर चैलेंज या कॉमेडी सर्कस जैसे कार्यक्रमों ने भरपूर हंसाया। इनमें थोडी फूहडता भी हो गई, पर उसे नोटिस नहीं किया गया। इनसे आमजन में यह उम्मीद जगी कि अपनी प्रतिभा जगजाहिर कर वे भी सेलिब्रिटी बन सकते हैं। वैसे कुछ सामाजिक मनोवैज्ञानिकों ने इसे ईजी मनी कॉन्सेप्ट से जोडकर देखने की कोशिश भी की, पर इसे तब बहुत महत्व नहीं मिला। विरोध अब शुरू हुआ है और इसे अहमियत भी तब दी जा रही है, जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगा है।

कडवा नहीं, बीभत्स

यह सच सिर्फ कडवा होता तो शायद चिंता का विषय नहीं बनता। सच तो यह है कि कडवा सच बर्दाश्त करने में भारतीय समाज का कोई जवाब नहीं है। कणाद से लेकर अष्टावक्र और महर्षि अरविंद तक इसके उदाहरण हैं। लेकिन चैनलों के इस सच से समाज को दिक्कत इसलिए हो रही है, क्योंकि यह कडवे होने की हदें पार कर बीभत्सता की ओर बढ चुका है। यह सच सिर्फ संबंधित चैनल को छोडकर और किसी को भी फायदा पहुंचाने तो नहीं ही जा रहा है, उलटा नुकसान पहुंचाएगा। यह वजह है जो सडक से लेकर संसद तक हर तरफ इनका विरोध शुरू हो गया है।

दोहरे चरित्र का सवाल

अब अगर इस विरोध को कोई इस रूप में देखता है कि लोग अपना सच सामने आने से डर रहे हैं, तो सवाल यह है कि ऐसा सच सामने लाकर भी क्या होगा जिससे समाज का कोई हित सधने वाला नहीं है। किसी ने कितने लोगों के साथ कैसे संबंध बनाए या कभी उसने अपने किसी प्रियजन की जान लेने की बात सोची या नहीं, इससे पूरे समाज का क्या मतलब? भला दुनिया में ऐसे कितने जोडे होंगे जिनके बीच झगडे न होते हों और समाज में ऐसे कितने लोग होंगे जिन्होंने भावावेश में अपने किसी प्रियजन की जान लेने की बात नहीं सोची होगी? क्या इतने से मान लें कि उन्होंने गोली मार दी? बहुत देर नहीं लगती, घंटे भर बाद ही उन्हें अपने सोचने पर पछतावा होने लगता है। इस सोच से दुनिया को क्या लेना-देना है? खासकर तब जबकि लोगों की बेहद निजी बातों की प्रामाणिकता एक ऐसी मशीन तय कर रही है जिसकी विश्वसनीयता ही संदिग्ध है। जो लोग यह कहते हैं कि भारतीय समाज दोहरे मूल्यों-मानदंडों वाला है, उन्हें टॉमस हार्डी का टेस ऑफ द डर्बरविले और डीएच लॉरेंस का संस एंड द लवर्स जरूर पढना चाहिए। ये दोनों ही लेखक भारतीय नहीं थे और इन किताबों में इन्होंने यूरोपीय समाज की ही बात की है।

समाज के किस काम का

खुद को कोसना फैशन हो तो बात अलग है, पर सच यह है कि दूसरे देशों में भी इन पर रोक लग चुकी है। वस्तुत: ज्यादातर रिअलिटी शो किसी न किसी पश्चिमी शो की नकल ही हैं। सच का सामना को ही लें, यह अमेरिकी शो मोमेंट ऑफ ट्रुथ का रूपांतर है। ग्रीस और कोलंबिया में भद्देपन के ही चलते इस पर प्रतिबंध लग चुका है। अमेरिका में भी इसके प्रसारण के बाद सर्वेक्षण से जाहिर हुआ कि वहां परिवारों में तलाक का ग्राफ बढ गया है।

अजीब बात है कि एक शो के जरिये तो परिवार को तोडने का इंतजाम होता है और दूसरा शो स्वयंवर की बात करता है। ऐसे लोगों के जो चुंबन के जरिये ख्याति पाते हों या साल भर के भीतर ही विवाह का पवित्र बंधन तोड देते हों। यही नहीं, जिन्हें कहीं काम नहीं मिलता वे एक जंगल में चले जाते हैं और फिर गुहार लगाते हैं कि मुझे बचाओ। कभी मेंढक खाते हैं और कभी चूहे। झरने के नीचे नहाते हैं और तर्क देते हैं कि नहाते समय कपडे कौन पहनता है?

ऐसा विवेकरहित सच समाज के किस काम का है और उसे क्यों दिखाया जाए। यह तर्क तो लोग देते हैं कि कोई शो आपको पसंद न आए तो रिमोट आपके हाथ में है, पर जनाब यह क्यों भूलते हैं कि रिमोट उन बच्चों के हाथ में भी है जिन्हें आप वोट देने और शादी करने लायक नहीं मानते। आइए जानते हैं इस मसले पर कुछ जानी-मानी हस्तियों का नजरिया।

जरूरी है सेंसरशिप

पायल रोहतगी, अभिनेत्री

मैं रिअलिटी शोज के खिलाफ नहीं हूं। चैनलों द्वारा नए-नए विषयों पर प्रसारित इन कार्यक्रमों से दर्शकों का भरपूर मनोरंजन तो होता ही है, साथ ही हमें भी काम मिल रहा है। बिग बॉस-2 की वजह से ही आज मैं मुंबई जैसे शहर में दुबारा सरवाइव करने योग्य हुई हूं। वैसे मैं भी सच का सामना की नियमित दर्शक हूं। मैं देखती हूं कि एक आम आदमी के अतीत में कितने रहस्य छिपे हुए हैं। जो एक्साइट करता है।

रिअलिटी शो में जो दिखाया जाता है, स्वाभाविक होता है। बिग बॉस के सेट पर हमें मालूम था किवहां चारों तरफ लगे कैमरे 24 घंटे हम पर नजर रखते हैं। शुरुआत में हममें से कई लोग कैमरा कॉन्शस थे। बडी सावधानी से काम करते थे। मगर इंसान अपनी इच्छाओं और आदतों को ज्यादा दिनों तक दबा नहींसकता। जल्दी ही हमारे बीच गाली-गलौच, झगडे आदि होने लगे। इस शो की यही यूएसपी थी। मुझे नहीं लगता कि इससे दर्शकों पर विपरीत असर पडता होगा। आज का दर्शक मेच्योर है। अगर उसे लगता है कि कोई शो देखने लायक नहीं है तो चैनल बदलने में देर नहीं करता। लेकिन इस बात का मैं विरोध करती हूं कि किसी को उसके निजी जीवन का ऐसा सच पूरे समाज को बताने के लिए मजबूर किया जाए जो उसने अपने बेहद करीबी लोगों को भी बताने लायक नहीं समझा और उससे समाज का कोई भला होने भी नहीं जा रहा है। मनोरंजन का यह कैसा स्वरूप है?

बिग बॉस हो या सच का सामना या फिर इस जंगल से मुझे बचाओ इस तरह के शोज के अति संवेदनशील दृश्यों पर सेंसर की नजर रहनी चाहिए। इस बात का ध्यान रखते हुए कि शो की स्वाभाविकता भी बनी रहे और दर्शकों का भी मनोरंजन हो जाए। एक बात और कहना चाहूंगी कि इन सब बातों के लिए सिर्फ चैनल पर दोषारोपण करना सही नहीं होगा। अगर हम ऐसे शोज को बायकॉट करना शुरू कर दें तो चैनल ऐसे कार्यक्रम क्यों दिखाएगा?

जो बिकता है वही चलता है

अनु मलिक, संगीतकार

पिछले 7-8 सालों में भारतीय टेलीविजन पर नजर डालें तो पता चलता है कि इसकी पूरी दुनिया ही बदल गई है। इस बदलाव पर हर किसी की निजी राय है। बहरहाल, मैं तो स्पष्ट रूप से यही कहूंगा कि जो बिकता है, वही चलता है। रिअलिटी शोज में कुछ सच्चाई है। आज युवा हो या बुजुर्ग या फिर मिडल एज्ड हर किसी की पहली पसंद हैं रिअलिटी शोज। अकसर भारतीय लोगों में बनावटीपन होने के कारण, अगर इस तरह के शो पसंद हों, तो भी लोग इस बात को सार्वजनिक तौर पर मानेंगे नहीं। हम जिन चीजों को देखना पसंद करते हैं, उनके बारे में भी अकसर यही जाहिर करना चाहते हैं कि ये हमें पसंद नहीं है।

यदि किसी रिअलिटी शो का फॉर्मेट हमें नहीं पसंद, तो क्यों नहीं लोग एकजुट होकर उसे बंद करवा देते हैं? क्या फिल्मों में अश्लीलता नहीं होती? उसे कैसे देख लेते हैं? हिंसक आचारण का भी तो कई बार अतिरेक हो जाता है, खून की नदियां बहती हैं। शरीर गोलियों से छलनी हो जाता है। उसे देखने का क्या तुक है? पर लोग देखते हैं और उसे मनोरंजन कहते हैं। परेशानी सिर्फ रिअलिटी शोज से ही क्यों?

इस दौर में मीनाकुमारी जैसी अभिनेत्री को कितना पसंद किया जाता? 60-70 के दशक में वह सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री थीं, पर आज का दौर अलग है। आम लोगों को मल्लिका शेरावत पसंद आने लगी हैं। उन्हें एक्टिंग कितनी आती है, यह एक अलग मुद्दा हो सकता है।

आपको एहसास होगा कि मैं इंडियन आयडल जैसे सबसे लोकप्रिय रिअलिटी शो के लिए चार सेशन तक जज था। अब पांचवा सेशन आ रहा है, और मैं फिर जज हूं। मेरे कमेंट्स पर काफी तीखी रिएक्शंस आती हैं। लोग कहते हैं कि उन्हें मेरा व्यवहार जरा भी पसंद नहीं आता। पर चैनल को शायद पंसद है, सो मैं हूं। मैं किसी को उसकी कमियां दर्शाता हूं, ताकि उसमें अगली बार निखार आ जाए, किसी को हर्ट करना मेरी मंशा नहीं होती।

ग्लैमर और स्टारडम का रास्ता अख्तियार करने के लिए आजकल रिअलिटी शो सबसे बडा माध्यम हैं। स्टार्स की फिल्में पिटने पर लोग उन्हें भूल जाते हैं, पर यहां कैंडिडेट हारने पर भी स्टारडम की सीढी चढ जाता है। यह कमाल रिअलिटी शो का है या फिर उस कैंडिडेट का, या लोगों के जुनून का.. यह आप निर्णय लें।

नफरत है तो न देखें

ईशा कोप्पीकर, अभिनेत्री

पिछले दिनों जब कलर्स चैनल की तरफ से एंकरिंग की ऑफर आई तो मैं मना न कर सकी। मुझे अच्छा पारिश्रमिक दिया उन्होंने और मेरे पास इन दिनों कोई इंटरेस्टिंग प्रपोजल भी नहीं था, तो मैंने थीम सुनकर हां कर दी। जहां तक टीआरपी के खेल का चक्कर है, हर दूसरे चैनल पर रिअलिटी शोज का तूफान आया हुआ है। निजी तौर पर मुझे बिग बॉस देखने में बडा मजा आता रहा। उससे जाहिर होता है कि जिन सेलिब्रिटीज को आम आदमी हर तरफ देखता है, उनका असली चेहरा क्या है। हम यह क्यों भूल रहे हैं कि यह सब सिर्फ मनोरंजन का मामला है। जिन लोगों को मनोरंजन के इस फॉर्मेट से नफरत है, वे न देखें रिअलिटी शो। बिग बी अमित जी जैसे मिलेनियम स्टार्स ने भी तो छोटे पर्दे पर आगमन कौन बनेगा करोडपति जैसे रिअलिटी शो से ही किया था। यह बात दूसरी है कि उनके शो का कॉन्सेप्ट अलग था। उसी शो को फिर शाहरुख खान ने भी किया, सलमान खान, माधुरी दीक्षित ने भी रिअलिटी शोज किए हैं। जाहिर है कि आम दर्शक रिअलिटी शो का पूरा आनंद ले रहे हैं। वक्त के साथ लोगों की रुचियां भी बदल रही हैं। मुझे पहले अखरते थे रिअलिटी शो के फंडे। लगता था कि बिग बॉस के घर में इतने लोग-जिनके स्वभाव, लाइफस्टाइल, पेशा सब कुछ भिन्न हैं, क्या होगा इनका? पर प्रोग्राम में सेलिब्रिटीज टके रहे। कुछ खास तमाशा भी नहीं हुआ। पर उनकी टीआरपी से चैनल को तो फायदा हुआ ही।

हर किसी की निगाह में यह पतन नहीं है। अधिकतर लोगों को कुछ मसाला चाहिए। जब खुद के जीवन में मसाले की कमी हो तो लोग यहां-वहां ताक-झांक करते हैं।

मेरा मानना है कि अब तो माहौल ही ऐसा हो गया है। हम और आप इसमें कुछ नहीं कर सकते। सरकार ही कुछ कर सकती है। करिश्मा कपूर, डेविड धवन, फरहा खान, सोहा अली कितने सितारे जुडे हुए हैं, रिअलिटी शो से, क्योंकि चैनल चाहते हैं। चैनल कहते हैं कि पब्लिक जो चाहती है, वही हम दिखाते हैं। जो बिकता है, वही दिखता है.. यही सच्चाई है।

संदेश की कोई परवाह नहीं

कुछ रिअलिटी शोज के बारे में जब मैं सोचता हूं तो लगता है कि यह सब करके हम क्या दिखा रहे हैं? कुछ शो तो स्वीकारने योग्य हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें आम लोग क्यों देखें, यह बात समझ में नहीं आती। आपके स्वयंवर को पब्लिक क्यों देखे? लोग शो में कीडे-मकोडे खाते रहे। यह किसलिए दिखाया जा रहा है? क्या आप चाहते हैं कि सभी कीडे खाएं। हो सकता है कुछ अजीब करने के पीछे टीआरपी का खेल हो, जो लोगों को इसे देखने के लिए प्रेरित करता है। लेकिन समाज को इससे संदेश क्या जा रहा है, इसकी परवाह तो ऐसे कार्यक्रमों में बिलकुल नहीं दिखती।

पिछले दिनों हुए इंडियाज गॉट टैलेंट ने साबित किया कि साफ-सुथरे लोग भी विनर होते हैं और सही कलाकार की पूछ आज भी है। इस शो में अनोखे लोग भी आए, लेकिन जीत उन्हीं की हुई, जिन्होंने अपने अच्छे काम से लोगों का दिल जीता। इसके विपरीत सच के नाम पर सनसनी दिखा कर टीआरपी बढाने का खेल भी चल रहा है। कुछ सीरियलों का भी वही हाल है। बहुत लोग ऐसे रिश्तों को खोल रहे हैं, जिन्हें दिखाकर समाज का नुकसान कर रहे हैं। रिश्तों की कहानी आसपास की और परिवार की होने के साथ ही ऐसी भी होनी चाहिए किजो गलत है वह पर्दे में रहे। उसे दिखाकर हम उन्हें भी बता रहे हैं, जो इससे अनजान हैं। मैं नहीं मानता कि जो दिखता है वही बिकता है। हम सार्थक चीजें लाते हैं तो लोग उन्हें देखते हैं, पसंद भी कर रहे हैं। पर्दे पर पैसों के लिए लोग क्या-क्या कर रहे हैं यह उनका अपना मामला हो सकता है, लेकिन यह हमारा मामला भी होता है। क्योंकि हम भी यहां जीते हैं, दुनिया हमारी भी है। इसके लिए ठोस कदम की जरूरत है। वरना हम पाषाणकाल से यहां तक तो आ गए हैं, लेकिन कहां चले जाएंगे, यह सोचा भी नहीं जा सकता।

अच्छे ही नहीं लगे

शिवाजी साटम, अभिनेता

मैंने कई किस्म के किरदार निभाए हैं, लेकिन रिअलिटी शो मुझे कभी अच्छे नहीं लगे। मेरा पूरा परिवार ऐसे कार्यक्रम पसंद नहीं करता जहां दूसरों के जीवन में ताका-झांकी ही की जा रही हो। इन कार्यक्रमों में कोई सच्चाई नहीं है, फिर भी ये रिअलिटी शो कहलाते हैं। ड्रामा और प्रॉब्लम के बलबूते टीआरपी बटोरते हैं। ये आम लोगों के जीवन से बिलकुल अलग हैं, क्योंकि लाखों में कोई एक होगा जो ऐसे शो पसंद करता होगा। मेट्रोज में रहने वाले आधुनिक लोगों को शायद किसी की निजी जिंदगी में तांक-झांक करना भाता हो, पर हमारे देश की अधिकतर आबादी गांवों में रहती है, मुझे नहीं लगता कि नैतिकता का पतन दिखाने वाले रिअलिटी शोज उन्हें पसंद आते होंगे। इस जंगल से बचाओ जैसा रिअलिटी शो क्या हम अपने परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं?

ऐसे कार्यक्रमों में हमारे परिवारों के देखने लायक कुछ नहीं। मेरे अनुसार इन्हें बढावा ही नहीं देना चाहिए।

वैसे ऐसे कार्यक्रमों की बहुत चिंता करने की भी जरूरत नहीं है। हमारे बच्चों को ये इसलिए नहीं बिगाड सकते क्योंकि सबकी चाभी रिमोट हमारे हाथ में है। अगर हम ऐसे कार्यक्रम नहीं देखना चाहते, चैनल ही बदल दें और बच्चों पर ध्यान दें। क्योंकि बच्चों की जिम्मेदारी हमारे कंधों पर है। अगर हम उन्हें सही शिक्षा देंगे तो वह गलत चीजें खुद नहीं देखना पसंद करेंगे। मैं इस मुद्दे पर कोई कमेंट करना नहीं चाहता कि काफी सारे रिअलिटी शोज उन कलाकारों का किचन चलाते हैं, जिन्हें वैसे भी कोई काम मिलने से रहा। देश के सांसदों ने भी रिअलिटी शोज में हिस्सा लिया है। राजनीति से जुडी हस्तियां किस तरह से फूहड शोज में हिस्सा लेती हैं, यह मेरे समझ के बाहर है, जनता भी उनसे जवाबतलब नहीं करती। रिअलिटी शोज में रिअलिटी गायब है। डांस से जुडे रिअलिटी शोज में किसे बाहर निकलना है, किसे अंदर रहना है, यह सब कुछ तय है, पब्लिक को बेवकूफ बनाकर ये लोग अपनी दुकान चलाते हैं।

सबने की हमारी नकल

गजेंद्र सिंह, निर्माता-निर्देशक

जो लोग रिअलिटी शो के खिलाफहैं, उनसे कहना चाहूंगा किपहले वे रिअलिटी के मतलब पर गौर करें। आप घर में अपनी पत्नी-बच्चों आदि से बहुत प्यार करते हैं, मगर कभी-कभी हालात ऐसे बन जाते हैं कि जोरदार लडाई हो जाती है। यही कहानी रिअलिटी शो की होती है। एक-दूसरे को पछाडने की होड में मंच पर जो कुछ भी होता है, स्वाभाविक होता है। हम उस पर चाहकर भी प्रतिबंध नहीं लगा सकते। वरना इसे रिअलिटी शो नहीं कहा जा सकता। हालांकि कुछ शोज में अश्लीलता और अभद्रता जरूरत से ज्यादा परोसी जा रही है। यह सही नहींहै। मगर इस पर रोक लगाना भी संभव नहीं है। बेहतर होगा कि हम ऐसे शोज को महत्व ही न दें। आज हम तमाम विदेशी शोज की कॉपी कर रहे हैं। मैं बडे फº के साथ कह सकता हूं कि हमारे शोज को पूरी दुनिया ने कॉपी किया है।

होनी चाहिए संतुलन की सीमा

अर्जुन रामपाल, अभिनेता

कलाकार एक्सपेरिमेंटल होते हैं। वे एक साथ कई काम करना चाहते हैं। मैंने पिछले साल डांस रिअलिटी शो नच बलिए के लिए बतौर जज काम किया था। मेरे लिए यह काम नया और चैलेंजिंग था। रुटीन कामों से यह अलग होता है और रोमांचक भी। खैर, मैंने इसका मजा लिया। रिअलिटी शोज की क्रेज अब बहुत ज्यादा बढ चुकी है। यह कहां तक ले जाएगी, कह नहीं सकते। मुझे भी कई बार अटपटा लगता है कि भारतीय टेलीविजन की दुनिया को यह क्या हो गया है। हम पश्चिम का अनुकरण करते हुए वापस पाषाणकाल की ओर जा रहे हैं। मुझे लगता है कि हमें मनोरंजन में संतुलन की एक सीमा तय करनी होगी, पर ऐसा नहीं हो रहा है। इस माध्यम से जुडने वाले कुछ लोग अपनी संस्कृति-सभ्यता-नैतिकता को घर छोडकर आ रहे हैं। खैर, लोगों को इस समय महंगाई, दुनिया भर की बीमारियां घेरे हुए हैं। दाल तक सौ से ऊपर जा पहुंची है, जो आम आदमी की रोजमर्रा की अनिवार्य जरूरत है, फिर रिसेशन तो है ही। लोग कई समस्याओं से रोजाना जूझ रहे हैं। उन्हें इडिअट बॉक्स पर जो नजर आता है, खासकर जो स्पाइसी हो, उसे वे चाव से देखते जाते हैं। सच का सामना जैसे शो इसीलिए पॉपुलर हो रहे होंगे। अपनी परेशानियां पल भर मिटाने-भुलाने वाले मैजिक तो इन रिअलिटी शोज में भरे हैं, फिर क्यों न लोग इसे देखेंगे?

जब मैं जज था, मुझे चैनल की तरफ से कोई बंदिशें-शर्ते नहीं थीं कि मुझे कैंडिडेट्स को नीचा दिखाने के लिए कुछ टीका-टिप्पणी करनी होगी। सो कहना मुश्किल है कि क्यों कभी-कभी जजेज इन शोज में ऐसी बातें करते नजर आते है।

पैसा कमाना जिनका उद्देश्य है, वो सारे लोग इन शोज के आसपास नजर आते हैं और पैसा कमाना किसका उद्देश्य नहीं है? मैं मानता हूं इस बात से कि बिग बॉस या फिर खतरों के खिलाडी रिअलिटी शोज में हरसंभव नॉवेल्टी दिखाई जाती है, जिससे टीआरपी बढे, क्योंकि कंपटीशन में हर किसी को सफल होना है। इसे कोई रोके कैसे? यहां रिअलिटी शोज में चंद शख्सीयतें ऐसी भी आई हैं कि जिनका क्रिमिनल बैकग्राउंड था, पर फिर भी वे शोज में भागीदार थे। लोगों ने उन्हें देखने-सुनने में रुचि दिखाई। यह हो रहा है, क्या कीजिएगा? शहरी लोगों की नहीं छोटे-बडे गांवों की दिलचस्पी बदल चुकी हैं। जो समाज में अच्छे बदलाव चाहते हैं, वे नहीं चाहेंगे कि वे कुछ ऐसा देखे जिसका सीधा असर अगली पीढी पर हो। पर अब हाथ में रिमोट के अलावा कुछ रहा नहीं.. यही एक रिअलिटी बन चुकी है।

गाइडलाइन तो होनी ही चाहिए

फराह खान, निर्देशक

सच का सामना तो मेरा फेवरिट शो है। मैं कितनी भी व्यस्त रहूं, हर एपीसोड देखती हूं। यहीं पता चलता है कि सेलिब्रिटी ही नहीं, आम आदमी की जिंदगी में भी कम विवाद नहींहोते। यह बात एक स्टार और आम आदमी के बीच का अंतर खत्म करती है। इसमें गलत क्या और क्यों है? भारतीय टीवी दर्शकों के लिए यह नया और एक्साइटिंग कंसेप्ट है। यही इसकी सफलता की वजह है। जहां तक सवाल यह है कि लोग बेहद निजी सवालों का जवाब क्यों दें, तो प्रतिभागी को पता रहता है कि आने वाला सवाल उसके लिए कितना निजी हो सकता है। अगर वह उन बातों को सार्वजनिक नहीं करना चाहता तो जीती हुई रकम के साथ बाहर जा सकता है। अगर एक दर्शक के नाते आपको शो पसंद नहीं आ रहा तो रिमोट आपके हाथ में है।

आज जमाना प्रतिद्वंद्विता का है। हर कोई रेस में आगे रहना चाहता है। सारे चैनल दर्शकों को रिझाने के कुछ नए और रोचक प्रोग्राम लेकर आ रहे हैं तो इसमें बुराई क्या है? इसका लाभ तो अंतत: दर्शकों को ही मिल रहा है न! मैं नहीं मानती कि टीवी पर दिखाए जा रहे ज्यादातर रिअलिटी शो विवादों से घिरे हैं। मैं खुद बहुत प्रोफेशनल हूं। बहुत सोच-समझकर असाइनमेंट स्वीकार करती हूं। इन दिनों स्टार प्लस पर मेरा एक रिअलिटी शो तेरे मेरे बीच दिखाया जा रहा है, जहां एक्टर और कॉमन मैन को आमने-सामने बैठ कर दिल की बातें करने का मौका मिलता है। बहुत ख्ाूबसूरत कंसेप्ट है। इस तरह के शो की पहले कभी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

कुछ लोगों को सच का सामना का सच पच नहीं रहा है। हमारी सोसायटी में डबल स्टैंडर्ड के लोग ज्यादा हैं। उन्हें शो से आपत्ति नहीं है। उन्हें डर इस बात का है कि अगर उन्हें इस शो के लिए बुलाया गया तो वे कैसे इनकार कर सकेंगे। मैंने कहीं सुना था कि हमारे कुछ राजनेताओं ने शो में शामिल होने से मना कर दिया था। अगर चैनल ने हॉटसीट के लिए मुझे इन्वाइट किया तो मैं मना नहीं करूंगी। मैं हॉटसीट पर बैठकर इंज्वाय करूंगी। इस जंगल से मुझे बचाओ का एक भी एपीसोड मैंने देखा नहीं है, लेकिन यदि इसमें वाकई जरूरत से ज्यादा अश्लीलता या फूहडता है तो इस पर सेंसरशिप होनी चाहिए। जिस तरह टीवी का विस्तार हो रहा है, उसे देखते हुए फिल्मों की तरह टीवी कार्यक्रमों के लिए भी एक गाइडलाइन तो होनी ही चाहिए। मैं तो कहूंगी कि चौबीस घंटे चलने वाले इलेक्ट्रॉनिक न्यूज मीडिया के लिए भी एक गाइडलाइन बननी चाहिए।

इंटरव्यू: दिल्ली से राजेश श्रीवास्तव एवं रतन मुंबई से पूजा सामंत, एस. सुशीला व मीनाक्षी तिवारी

इष्ट देव सांकृत्यायन
 
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