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<title>Sakhi - Yahoo! Jagran News</title>
<description>Yahoo! Jagran Hindi News</description>
<language>hi</language>
<copyright>Copyright (c) 2009  Yahoo! Inc. All rights reserved.</copyright>
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<lastBuildDate>Tue, 24 Nov 2009 19:52:30</lastBuildDate>
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	<title>Yahoo! Jagran Hindi News - Sakhi</title>
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	<item>
		<title>अपने ढंग से जिए</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=6</link>
		<description>
		अकसर मैं सोचती हूं कि बुढापा इतना दुखमय क्यों होता है? हमने अपना सारा जीवन बच्चों की अच्छी परवरिश के संघर्ष में बिता दिया और इसी उम्मीद पर जीते रहे कि बच्चे हमारे बुढापे का सहारा बनेंगे। लेकिन शादी होते ही हमारे दोनों बेटे बिलकुल बदल गए। आज हम अपने पुश्तैनी मकान में अकेले पडे हुए हैं। दोनों बेटे अब अलग मकानों में रहते हैं। दोनों में से कोई भी हमारा हाल पूछने नहीं आता। पति सरकारी नौकरी में थे। उन्हें जो पेंशन मिलती है उससे हमारा किसी तरह गुजारा हो जाता है, लेकिन अकेलेपन से जी बहुत घबराता है। एक ही शहर में रहते हुए भी बेटे-बहू हमसे मिलने का समय नहीं निकाल पाते। हमारी शारीरिक अवस्था ऐसी नहीं रही कि हम बार-बार उनसे मिलने जा सकें। सबसे ज्यादा  परेशानी तब होती है,जब हम दोनों में से किसी एक की तबीयत खराब हो जाती है। तब हमारे लिए डॉक्टर के पास जा पाना भी बहुत मुश्किल हो जाता है। मैंने अपने कुछ गहने अपने पास संभालकर रखे हुए हैं। मेरी दोनों बहुएं अकसर मुझसे कहती हैं कि आप अपने गहनों और दूसरी चीजों का बंटवारा कर दें, लेकिन मैं अपनी जिंदगी में ऐसा करना ठीक नहीं समझती। इस वजह से मेरी बहुएं मुझसे नाराज रहती हैं और अकसर मुझे भला-बुरा कहती रहती हैं। समझ में नहीं आता कि ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए?  
 
सविता निगम, भोपाल  
 
विशेषज्ञ की राय  </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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	<item>
		<title>गुरुजी के आशीर्वाद से मिली मंजिल</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=6</link>
		<description>
		मैं मुंबई एक्टर बनने आया। मेरे पास अच्छी कद-काठी, दमदार आवाज और थिएटर का अनुभव था। पर हालात सोच के विपरीत निकले। गुजरते समय के साथ मेरी निराशा और हताशा बढ रही थी। कभी-कभी वापस जाने का खयाल आता, लेकिन लगता कि बैरंग जाऊंगा तो लोग क्या कहेंगे? एक दिन कमरे में यूं ही बैठे-बैठे अपने गुरु पंडित श्री देव प्रभाकर शास्त्री जी का ध्यान आया। किसी भी संकट-समस्या में मैं गुरु जी की शरण में चला जाता था। वे मेरा मार्गदर्शन करते थे। उस समय गुरु जी ने कहा, तुम जुझारू हो, इसलिए सफलता तुमसे बहुत दूर नहीं। तुम बहुत शोहरत और दौलत कमाओगे। बस छोटी-मोटी भूमिकाओं वाले प्रोजेक्ट को कभी हलके से मत लेना। उन्होंने कहा कि तीन दिन बाद तुम्हें एक टीवी शो के लिए बुलाया जाएगा, जिसका शीर्षक अंग्रेजी के एस अक्षर से प्रारंभ होगा। तीसरे दिन मुझे धारावाहिक स्वाभिमान में छोटा सा रोल मिला। अगले दिन से मैं शूटिंग पर जाने भी लगा। दिन-सप्ताह गुजरते गए, काम नहीं रुका। डायरेक्टर लंबे समय तक मेरे पात्र को विस्तार देते रहे। बेस्ट एक्टर के तौर पर कई पुरस्कार मिले। ये गुरु जीके आशीष से हुआ।  
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	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>स्त्री के पक्ष में दो नए फैसले</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=6</link>
		<description>
		महिलाओं के हित में पिछले दिनों अदालतें कई महत्वपूर्ण फैसले दे चुकी हैं। हाल ही में लिए गए दो नए निर्णय एक बार फिर इस बात को पुख्ता करते हैं कि अदालतें अब स्त्रियों एवं बच्चों के अधिकारों के प्रति वास्तव में गंभीर रुख अपनाने लगी हैं।  
 
गोद लेने का अधिकार बढा 
 
पहला फैसला मुंबई उच्च न्यायालय का है। पहले हिंदू एडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 में प्रावधान था कि हिंदू स्त्री या पुरुष के पास यदि पहले से ही एक बेटा है तो वह दूसरा बेटा गोद नहीं ले सकता और यदि पहले से बेटी है तो दूसरी बेटी गोद नहीं ले सकता। </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>मिलावट यानी धीमा जहर</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=6</link>
		<description>
		आए दिन अखबारों की सुर्खियों में छपता रहता है कि दूषित भोजन करने से इतने लोगों की मौत हो गई या इतने लोग बीमार हो गए। खाद्य पदार्थो में मिलावट किसी धीमे जहर से कम नहीं है। 
 
हल्दी: पिसी हुई हल्दी में सफेद पाउडर या पीली मिट्टी मिलाकर उसमें केमिकल से पीला रंग मिलाया जाता है।   
                     काली मिर्च: काली मिर्च में पपीते के बीज बडी मात्रा में मिलाए जाते हैं।  </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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	<item>
		<title>हलचलें</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=6</link>
		<description>
		बिग बी ने बनाया नया रिकॉर्ड 
 
बॉलीवुड के शहंशाह अमिताभ बच्चन ने एक और कीर्तिमान बनाया है। बिग बॉस सीजन 3 में भाग लेने के लिए उन्हें प्रत्येक शो के हिसाब से 1.50 करोड रुपये में साइन किया गया है। बिग बॉस सीजन 3 में बच्चन साहब को 84 एपिसोड्स में भाग लेने के बदले 126 करोड रुपये मिलेंगे। गौरतलब है कि आज तक भारतीय टीवी उद्योग में किसी भी कलाकार को इतनी बडी कीमत पर साइन नहीं किया गया था। ये पहली बार है जब किसी कलाकार को टीवी में काम करने के बदले इतनी बडी रकम मिल रही है। बिग बी को मिल रहे इस मेहनताने के आसपास कोई भी टीवी कलाकार नहीं ठहरता है। सलमान को उनके शो दस का दम के लिए जहां 1 करोड रुपये प्रति एपिसोड में साइन किया गया है, वहीं अक्षय कुमार को भी खतरों के खिलाडी सीजन 2 के लिए लगभग 1 करोड रुपये ही मिल रहे हैं। 
 
पुतिन ने मजदूर को गिफ्ट की घडी </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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	<item>
		<title>नहीं भूलता वह पल</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=6</link>
		<description>
		बचपन के दिनों को याद करते हुए, मुझे ऐसा लगता है कि जैसे कल की ही बात हो। मैं बहुत बडे संयुक्त परिवार में पली-बढी हूं। मेरे माता-पिता काफी उदार और सहृदय थे। घर के कामकाज के लिए रखे गए नौकरों का भी वे परिवार केसदस्यों की तरह  खयाल रखते थे। इसी वजह से घरेलू सहायक हमारे साथ बहुत अपनेपन के साथ पेश आते थे। घर में खाना बनाने के लिए एक महाराज थे। वह लंबे अरसे से हमारे घर पर खाना बनाने का काम कर रहे थे। इसलिए वह परिवार के सदस्य की तरह थे और हमें बहुत प्यार करते थे। यदि हम बच्चे कोई गलती करते तो वह अधिकार भाव से हमें डांट भी देते थे।  
 
उनसे जुडी स्मृतियां आज भी मेरे जेहन में उसी तरह ताजा हैं, जैसे कल की ही बात हो। संयोगवश उनके बेटे ने मेरे साथ ही दसवीं की परीक्षा दी थी और हम लोगों को परीक्षाफल का इंतजार था। मैं पढाई को गंभीरता से नहीं लेती थी इसलिए सबको मेरे पास होने पर शक था। पर महाराज को पूरा विश्वास था कि मैं पास ही नहीं, बल्कि बहुत अच्छे नंबरों से पास होऊंगी। रिजल्ट आया और मैं सेकंड डिवीजन से पास हो गई (आज से 45 साल पहले सेकंड डिवीजन की बहुत कीमत थी) पर महाराज का बेटा फेल हो गया, जिसकी वजह से हम सब दुखी थे और परिवार में कोई भी मेरे पास होने की खुशी नहीं मना पा रहा था। तभी महाराज बहुत खुश होकर आए और उन्होंने मुझे बधाई दी और कहा कि बिटिया आज मैं बहुत खुश हूं और आपकी पसंद का खाना बनाऊंगा। मुझे बहुत हैरानी हुई और मैंने उनसे कहा कि आप इतने खुश कैसे हो सकते हैं, जबकि आपका बेटा फेल हो गया है। इस पर उन्होंने बडे स्नेह से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,बेटा फेल हो गया तो क्या हुआ? बिटिया तो अच्छे अंकों से पास हो गई। आज इतने वर्षो के बाद भी जब मैं इस घटना को याद करती हूं तो मेरी आंखें भर आती हैं। </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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		<title>सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200910&amp;category=6</link>
		<description>
		हमने बडी मुश्किलें उठाकर अपने तीन बेटों और दो बेटियों की परवरिश की। मेरे पति का अपना व्यवसाय था, लेकिन पैसों की हमेशा तंगी रहती थी। फिर भी हमने अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों की सारी फरमाइशें पूरी कीं। अब बेटे-बेटियों की शादी हो चुकी है और सब अपने जीवन में खुश  हैं। बडा बेटा मेरे पति का व्यवसाय संभालता है और अन्य दो बेटे नौकरी करते हैं। मैं यहां बडे बेटे-बहू के साथ रहती हूं। सारी संपत्ति, चाहे वह मकान हो या व्यवसाय मेरे पति की मेहनत से अर्जित की गई है। लेकिन अब उम्र बढने के साथ धीरे-धीरे पति ने व्यवसाय और घर की जिम्मेदारियां बडे बेटे को सौंप दीं। लेकिन अब बेटा-बहू हमें कुछ समझते ही नहीं। हम उनके मुंह से प्यार के दो बोल सुनने के लिए तरस जाते हैं। अब तो हमें यह भी मालूम नहीं चलता कि हमारे कपडों के व्यवसाय से कितनी आमदनी होती है? अपने ही घर में हम एक-एक पैसे को मोहताज हैं। दवाओं और दूसरी छोटी जरूरतों के लिए हमें बेटे के आगे हाथ फैलाने पडते हैं और ऐसे मौकेपर वे बडी बेरुखी  से पेश आते हैं। दूसरे बेटे भी हमारी खोज-खबर नहीं लेते। ऐसी स्थिति में समझ नहीं आता कि क्या किया जाए?   
 
आशा जैन, जयपुर 
 
 विशेषज्ञ की राय  </description>
	 	 <pubDate>2009-10-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>टाइमलेस ब्यूटी</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200910&amp;category=6</link>
		<description>
		फैशन में इतिहास की वापसी कोई नई बात नहीं है। पुराने जमाने के परिधान हों या आभूषण, समय-समय पर नए जमाने के लोगों को आकर्षित करते रहते हैं। आज तमाम राजसी गहने आम लोगों की पहली पसंद बन गए हैं। ऐतिहासिक कला और संस्कृति को चाहने वाले आज भी कुंदन की एंटीक ज्यूलरी के प्रशंसक हैं। अपने कलात्मक डिजाइनों के कारण विंटेज ज्यूलरी कभी किसी दौर में चलन से बाहर नहीं होती। बल्कि अपने स्टाइलिश अंदाज से ये अपने समय की रुचि और पसंद का बखान करती है। ये ज्यूलरी कैजुअल और फॉर्मल वेयर दोनों के साथ जंचती है। विंटेज ज्यूलरी ऐसी है जो पीढी दर पीढी तक चलती रहती है। मॉडर्न और कंटेंपरेरी ज्यूलरी की तुलना में एंटीक और विंटेज ज्यूलरी हमेशा कीमती होती है। यह जानना दिलचस्प होगा कि किस दौर में कौन सी विंटेज ज्यूलरी क्यों प्रचलन में रही। 
 
विक्टोरियन ज्यूलरी 1837-1901 
 
यह वह समय था जब रानी विक्टोरिया ने राज-पाट संभाला और इसी समय फैशन की दुनिया में जबर्दस्त बदलाव आए। इस समय की ज्यूलरी रोमेंटिक और राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत थी। इस स्टाइल को विक्टोरियन नाम दिया गया। उनके पति प्रिंस अल्बर्ट इसके असली प्रमोटर थे। उन्होंने ब्रिटेन की कला, धर्म और पारंपरिकता को ज्यूलरी के माध्यम से प्रचलित कराने में योगदान दिया। उनके निधन के बाद रानी विक्टोरिया शोक में चली गई और एक नए स्टाइल का आरंभ हुआ शोक ज्यूलरी के रूप में। इसकी खासियत यह थी कि अपने प्रियजन के बालों को ज्यूलरी में पिरो कर बनाया जाने लगा। ये बाल तार का काम करते थे। भले ही सुनने में ये नागवार लगे, लेकिन ये ज्यूलरी प्रेम और संवेदनशीलता का पर्याय बनी। बाद में जब मशीनों से ज्यूलरी बनने लगी तो विक्टोरियन युग की स्त्रियों को यह पसंद नहीं आई। मिड सेंचुरी तक ज्यूलरी यूरोप से आती थी लेकिन अब अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में भी बनने लगी। इसी समय टिफनी ने हाई स्टैंडर्ड की ज्यूलरी बनानी शुरू कीं व यूरोप में बडे-बडे शोरूम खोले। </description>
	 	 <pubDate>2009-10-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>जीवन में नई शुरुआत के संकेत</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200910&amp;category=6</link>
		<description>
		बडी विचित्र बात है, जिसका अर्थ मैं समझ नहीं पा रहा। 3-4 महीने से मुझे बार-बार एक सपना दिखाई दे रहा था। सपने में एक नवजात शिशु का बायां हाथ दिखाई देता है। हाथ का आकार चौकोर है तथा छोटी-छोटी अंगुलियां है। शिशु का केवल आभास हो रहा है, लेकिन हाथ स्पष्ट दिख रहा है। छोटी-छोटी गुलाबी उंगलियां मानो एक इबारत लिखने की तैयारी कर रही हों। सपने के बाद मैं चौंक कर उठ जाता हूं। काफी सोचने के बावजूद इसका अर्थ नहीं समझ पा रहा हूं। एक अन्य सपने का अनसुलझा रहस्य भी किसी खास घटना की शुरुआत का इशारा करता है। मैं देखता हूं कि मैं दिन निकलने से पहले घर से बाहर निकलता हूं। मुझे बहुत से लोग रंग-बिरंगे वस्त्रों में दिखाई देते हैं। वहीं स्विमिंग पूल भी है, जिसमें नीले रंग का पानी भरा हुआ है। मैंने सफेद कुर्ता-पजामा पहना है। वहां भीड मेरा स्वागत कर रही है। 
 
विश्लेषण  
 
स्वप्न, दृष्टा के जीवन में नई विकास प्रक्रिया का संकेत हैं। नई प्रतिभा व क्षमताओं का प्रतीक हैं। हाथ ऊपर उठा हुआ दिखाई देने का अर्थ है कि कोई व्यावहारिक अनुभव हासिल कर रहा है, लेकिन बायां हाथ थोडी चिंता दर्शा रहा है। हाथ हमारे जीवन में नियंत्रण, एक्टिविटी और पॉवर का प्रतीक है। बाएं हाथ का अर्थ है- कोई स्त्री रास्ता दिखाने में सहायक होगी। अंतर्दृष्टि का विकास होगा। यह थोडा खतरे से खेलने का इशारा है। भावनात्मक तथा अंतश्चेतना के विकास और मजबूती की जरूरत है। </description>
	 	 <pubDate>2009-10-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>समलैंगिकता को वैधानिक मान्यता देना कहां तक उचित</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200910&amp;category=6</link>
		<description>
		मानसिक विकृति का द्योतक 
 
 हमारी संस्कृति में ऐसे विकृत यौन संबंध के लिए कोई जगह नहीं है। समलैंगिकता एक तरह की मानसिक विकृति है, जो बचपन में अनुकूल वातावरण नहीं मिलने, माता-पिता द्वारा समुचित पालन पोषण न होने, असामान्य परिस्थितियों में रहने आदि के कारण विकसित हो जाती है। इसे बच्चों की सही परवरिश और मनोवैज्ञानिक परामर्श से नियंत्रित किया जा सकता है। इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि समलैंगिक दंपती संतान गोद ले सकते हैं, लेकिन ऐसे बच्चों को समाज किस दृष्टि से देखेगा, यह एक विचारणीय प्रश्न है। ऐसे संबंधों को वैधानिक मान्यता देने के बाद सामाजिक मूल्यों का तेजी से ह्रास होने लगेगा। अनैतिकता और व्यभिचार को बढावा मिलेगा। इससे एड्स जैसी स्थितियों का भी बडी तेजी से प्रसार होगा। अगर इन संबंधों को अपराध मानकर समलैंगिकों को दंडित न किया जाए, तो कम से कम इसे नैसर्गिक मानकर वैधानिक मान्यता देना भी उचित नहीं है।  
 
माया मंगला, दिल्ली            </description>
	 	 <pubDate>2009-10-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	
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