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<title>Sakhi - Yahoo! Jagran News</title>
<description>Yahoo! Jagran Hindi News</description>
<language>hi</language>
<copyright>Copyright (c) 2009  Yahoo! Inc. All rights reserved.</copyright>
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<lastBuildDate>Wed, 25 Nov 2009 01:52:34</lastBuildDate>
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	<title>Yahoo! Jagran Hindi News - Sakhi</title>
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	<item>
		<title>कहानी ही मुझे प्रभावित करती है: प्रियांशु चटर्जी</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=8</link>
		<description>
		हिंदी-बांग्ला फिल्मों का जाना-पहचाना चेहरा हैं प्रियांशु चटर्जी। मूल रूप से दिल्ली के रहने वाले प्रियांशु ने कुछ वर्षो पूर्व जब फिल्मों में कदम रखा, तब वे चार्टर्ड एकाउंटेंट का कोर्स कर रहे थे। एकाएक उन्होंने फिल्मों का रुख कर लिया। उनकी पहली फिल्म तुम बिन को दर्शकों का अच्छा रिस्पॉन्स मिला। पिछले दिनों उनकी फिल्म चिंटू जी रिलीज हुई। इस अवसर पर सखी कार्यालय में उनसे हुई मुलाकात के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं।  
 
दिल्ली में पैदा हुए और पले-बढे प्रियांशु चटर्जी पिछले 10-11 वर्र्षो से मुंबई में हैं। हिंदी में तुम बिन, पिंजर, भूतनाथ, मदहोशी, दिल का रिश्ता जैसी कई फिल्मों के बाद हाल ही में ऋषि कपूर के साथ रंजित कपूर के निर्देशन में बनी फिल्म चिंटू जी रिलीज हुई है। इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका में हॉलीवुड फिल्म फ्लोरिडा रोड की शूटिंग भी उन्होंने हाल ही में पूरी की है। ऑर्थर कानन डायल की पुस्तक पर बनने वाली फिल्म गुमशुदा में भी वह काम कर रहे हैं। कई बांग्ला फिल्मों में भी उन्होंने काम किया है। सखी कार्यालय में उनसे हुई एक मुलाकात के चंद अंश यहां प्रस्तुत हैं - 
 
चार्टर्ड एकाउंटेंट (सी.ए.) बनते-बनते अचानक ट्रैक कैसे बदल गया? फिल्मों में कैसे आए? </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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		<title>दोस्त के बिना जिंदगी अधूरी: मुग्धा गोडसे</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=8</link>
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		जिंदगी को लेकर आपका नजरिया क्या है? 
 
जीओ और जीने दो। आपके लिए जीओ कल की चिंता मत करो, न बीते हुए कल की न आने वाले कल की। 
 
कहते हैं जिंदगी सुख-दुख का संगम है। क्या आप इस बात से इत्तेफाक रखती हैं।
बिलकुल। दरअसल दु:ख से ही सुख की मौजूदगी का पता चलता है। साथ ही दु:ख ही हमें आगे बढने की प्रेरणा देता है। </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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	<item>
		<title>दुनिया में रहकर भी फकीर हैं: यश चोपड़ा</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200911&amp;category=8</link>
		<description>
		यह न पूछें कि क्यों, लेकिन अपने जीर्ण-शीर्ण बंकरनुमा दफ्तर से निकल कर यशराज स्टूडियो के सुसज्जित अहाते में चलते समय मुझे जॉर्ज ब‌र्न्स की पंक्तियां याद आई। सौ साल तक जीवित रहे हॉलीवुड के कॉमेडियन जार्ज ब‌र्न्स ने कहा था, मैं अकेला बच जाने तक शो बिजनेस में टिका रहूंगा..। 
 
उन पंक्तियों की याद स्वाभाविक थी, क्योंकि मैं किसी और से नहीं, यश चोपडा से मिलने जा रहा था, जो पिछले पचास सालों से डायरेक्टर हैं। उनकी पहली फिल्म धूल का फूल वर्ष 1958 में आई थी।  
 
लिफ्ट से बाहर निकलते समय मुझे भगवान बुद्ध की मूर्ति दिखी। मुझे यश चोपडा के भव्य दफ्तर का रास्ता बताया गया। यश चोपडा अपनी पहचान बन चुके सफेद शर्ट-पैंट में वहां मौजूद थे। कमरे की दीवारें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवार्ड से सजी हुई थीं। उनके बीच फिल्मफेयर अवार्ड की ट्राफियां भी थीं। यश चोपडा की कुर्सी के पीछे तीन तसवीरें लगी थीं। माता, पिता और बडे भाई बी. आर. चोपडा की तस्वीरों पर फूल माला टंगी थी। ऐसा लग रहा था कि वे ऊपर से यश चोपडा को निहार रहे हों। करीने से सजी उनकी मेज पर उनके दोनों बेटे उदय और आदित्य की तसवीरें भी रखी थीं। कमरा पूरी तरह से प्रकाशित था। 
मैं उनसे उनकी फिल्मों, शो बिजनेस और उनके बारे में बातें करने आया था। पूरी फिल्म इंडस्ट्री उन्हें प्यार और आदर से यश जी कहती है। वे मेरे सामने बैठे थे और ऐसा लग रहा था कि कोई अपने कंधों पर भारी बोझ लिए बैठा है। मुझे लगता है कि यह स्वाभाविक है। जब आपका सभी आदर करते हैं और आप उनके लिए आदर्श बन जाते हैं तो फिर आपको उनकी अपेक्षाओं के मुताबिक भी जीना पडता है। स्वयं से एक संघर्ष जारी रहता है। यह आसान काम नहीं है। मशहूर होने के साथ शक्ति आती है और उस शक्ति के साथ जिम्मेदारी बढ जाती है। अपने साथ काम करने वालों की जिम्मेदारी और उन अनगिनत लोगों की भी जिम्मेदारी, जो आपके दिशा-निर्देश की उम्मीद में रहते हैं। फिल्म इंडस्ट्री एक ऐसी दुनिया है, जहां असफलता सुनिश्चित है और कामयाबी एक चमत्कार है।  </description>
	 	 <pubDate>2009-11-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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		<title>पैसे कमा सकते हैं, रिश्ते नहीं: विद्या बालन</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200910&amp;category=8</link>
		<description>
		 आपकी नजर में पैसे की क्या अहमियत है?  

मेरी नजर में ही क्यों, हम सभी की नजर में पैसे की बहुत कीमत है। लेकिन हम उसे कितना महत्व देते हैं यह हमारी सोच पर निर्भर है। हम सभी ने अकसर यह अनुभव किया होगा कि पैसा कभी एक जगह ठहरता नहीं, वो आता है और तुरंत दूसरी जगह चला जाता है। 
 
आपके अनुसार जिंदगी के लिए पैसा ही सब कुछ है? </description>
	 	 <pubDate>2009-10-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>अभिनेत्रियों की पहली पसंद</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200909&amp;category=8</link>
		<description>
		कबीर लाल बॉलीवुड के मशहूर कैमरामैन हैं। चाहे कोई रोमांटिक दृश्य हो या स्टंट से भरपूर एक्शन सीन-परदे पर हर तरह के दृश्यों को ज्यादा से ज्यादा प्रभावशाली बनाना इनका खास मकसद होता है। कबीर लाल के बारे में मशहूर है कि किसी भी अभिनेत्री के सौंदर्य को और भी अधिक निखार कर परदे पर लाने के मामले में उनका कोई जोड नहीं है। ऐश्वर्या राय से लेकर कैटरीना कैफ जैसी अभिनेत्रियां भी चाहती हैं कि उनकी फिल्म की फोटोग्राफी कबीर लाल ही करें।  
 
प्रेरणास्रोत थे पिता 
 
पिता के गुणों का थोडा-बहुत असर तो बेटे पर होता ही है। इसी कहावत को कबीर लाल ने भी  सही चरितार्थ किया है। कबीर दक्षिण भारतीय फिल्मों के लोकप्रिय कैमरामैन स्व.एस.एस. लाल के पुत्र हैं। अपने पिता की कार्यशैली की चर्चा करते हुए कबीर बताते हैं, पिताजी प्राकृतिक सौंदर्य को अद्भुत तरीके से परदे पर उतारते थे। अंधेरे थियेटर में भी दर्शक खुद को सुरम्य पहाडियों की गोद में बैठा महसूस करता था। फिल्म की हीरोइन परदे पर किस तरह ज्यादा से ज्यादा ग्लैमरस दिख सकती है। इस कला में उनका कोई सानी नहींथा। पिताजी की इस कला को समझने के इरादे से मैं अकसर किसी न किसी बहाने से सेट पर चला जाता था। उनकी कार्यशैली को समझने की कोशिश करता था। कभी-कभी घूमने के बहाने मैं उनके साथ आउटडोर शूटिंग पर भी चला जाता था। फोटोग्राफी के प्रति मेरी इस उत्सुकता की बात उन्हें किसी अभिनेत्री ने बताई। पिताजी ने मुझसे बात की और मुझे अपना सहायक बना लिया। उनके सहायकों में मेरी गिनती सबसे निचले स्तर पर थी। वह चाहते थे कि मैं शून्य से सीखूं। उनके साथ मैंने लगभग आधा दर्जन फिल्में कीं। लेकिन दुर्भाग्यवश इसी बीच एक दुर्घटना में उनका निधन हो गया। इस अचानक आघात से मैं लगभग टूट सा गया था। समझ में नहींआ रहा था कि शुरुआत कहां से करूं। ऐसी मुश्किल परिस्थिति में पिताजी की पहचान और लोगों के बीच उनकी अच्छी साख मेरे लिए बहुत बडा सहारा बनी।उनके एक करीबी दोस्त, जो दक्षिण भारतीय सिनेमा के नामचीन प्रोड्यूसर थे, उन्होंने मुझे अपनी नई तेलगू फिल्म कर्तव्य के लिए स्वतंत्र कैमरामैन के तौर पर साइन कर लिया। लेकिन तब मैं उतना परिपक्व भी नहीं था कि एक पूरी फिल्म की जिम्मेदारी ले सकूं। तब मेरे सामने करो या मरो जैसी स्थिति थी। मुझे एहसास था कि इस फिल्म पर मेरा घर, परिवार और करियर सब कुछ टिका हुआ है। मैंने इसे चुनौती के तौर पर स्वीकारते हुए चौबीस घंटे अथक मेहनत की। पिताजी से मैंने जो कुछ सीखा था, सब कुछ इस फिल्म में झोंक दिया। अंतत: मेरी मेहनत रंग लाई। कर्तव्य सुपरहिट हुई। इसके बाद पीछे मुड कर देखने की जरूरत महसूस नहीं हुई। तकरीबन मुझे हर बडे बैनर के साथ काम करने का अवसर मिला। </description>
	 	 <pubDate>2009-09-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>संघर्ष बिना जिंदगी नहीं: मनोज तिवारी</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200909&amp;category=8</link>
		<description>
		आपकी नजर में जिंदगी? 
 
मेरी नजर में जिंदगी है हंस-मुस्कुराकर जीना।  
 
आपके लिए जिंदगी में सबसे अहम क्या है? </description>
	 	 <pubDate>2009-09-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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	<item>
		<title>रोल छोटा हो या बड़ा मायने नहीं रखता</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200909&amp;category=8</link>
		<description>
		छोटे-बडे दोनों परदों पर अपने बेहतरीन अभिनय के कारण अभिनेता राजीव खंडेलवाल लाखों दिलों पर राज कर रहे हैं। खास तौर पर लडकियों के पसंदीदा राजीव ने बॉलीवुड में अपना पहला कदम फिल्म आमिर से रखा। राजीव आजकल स्टार प्लस के नए रिएलिटी शो सच का सामना के कारण फिर चर्चा में हैं। वे इस शो को होस्ट कर रहे हैं। राजीव की एक खास उपलब्धि यह है कि संजय लीला भंसाली जैसे मशहूर मेकर ने उन्हें अपनी अगली फिल्म चेनाब गांधी के लिए साइन किया है। पर अभी वे इस फिल्म के बारे में बात नहीं करना चाहते हैं। उनका कहना है कि अभी फिल्म के बारे में बात करना जल्दी होगी। प्रस्तुत है पिछले दिनों राजीव से हुई एक खास मुलाकात..। 
 
मैं मूल रूप से जयपुर-राजस्थान का रहने वाला हूं। मेरे परिवार में अभिनय से किसी का कोई ताल्लुक नहीं है। मेरी पढाई दिल्ली के सेंट जेवियर्स में हुई। मेरी मास्टरी थी भाषाओं पर। हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू भाषाएं मुझे अच्छी तरह आती थीं। सोचा कि आगे चलकर बॉलीवुड या टेलिवुड के लिए कुछ लिखने का काम करूंगा, कुछ डॉक्यूमेन्टरीज-शार्ट फिल्म्स बनाऊंगा। इसलिए हायर एजूकेशन के बाद मैं मुंबई चला आया। पर यहां आने के थोडे समय बाद ही मुझे बालाजी टेलीफिल्म्स ने अपने धारावाहिक कहीं तो होगा में मुख्य भूमिका के लिए ब्रेक दिया। हालांकि अभिनय के लिए मैं बहुत इच्छुक नहीं था, लेकिन कर लिया। 
 
निर्देशक-लेखक बनने के सपने लेकर आए आप अंत में एक्टर बन गए। यह कैसा लगा? क्या जिंदगी बदल गई आपकी? </description>
	 	 <pubDate>2009-09-01 05:30:04</pubDate>
	 	
	</item> 
	

	<item>
		<title>आदर्श दंपति नही हैं हम</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200909&amp;category=8</link>
		<description>
		अभिनेता ओम पुरी ने पर्दे पर हमेशा उन पात्रों को निभाया, जो जमीन से जुडे सच्चे लेकिन आम इंसान हैं। अकसर अभिनय की दुनिया के बाशिंदे अपनी वास्तविक दुनिया में स्टारडम के घेरे से बाहर नहीं आते। पर ओम पुरी का एक अलग पहलू है- एक प्यारा-सा पिता, एक समझदार पति और एक आम इंसान। वरसोवा, सात बंगला के उनके फ्लैट में बिना औपचारिकता के हुई गपशप में उनकी पत्नी नंदिता ने भी अपने कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को रखा। 
 
ओम जी, इस संबंध की शुरुआत कैसे हुई? 
 
ओम पुरी- मेरी पहली शादी अभिभावकों ने तय की। यह टिक नहीं सकी। मैं फिर अभिनय में व्यस्त हो गया। मेरी एक फिल्म की शूटिंग कोलकाता में चल रही थी। तभी नंदिता द टेलीग्राफ न्यूज पेपर से मेरा इंटरव्यू लेने आई। इसी दौरान वह मुझसे प्रभावित हुई। </description>
	 	 <pubDate>2009-09-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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		<title>कुछ तो बात है इस देवदास में</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200909&amp;category=8</link>
		<description>
		सुना है दिलीप साहब की तबीयत खराब है। मम्मी जानना चाहती हैं कि उनकी हालत कैसी है? मुझसे फोन पर किसी ने पूछा। मैं दुबई में बेटी पूजा भट्ट की फिल्म कजरारे के सेट पर था। फोन पाकिस्तान से आया था। मैं पता करके आपको बताता हूं। कहने के बाद मैं सायरा बानो का नंबर डायल करने लगा। वह आईसीयू में हैं। हमें कल रात उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पडा, क्योंकि बुखार उतर ही नहीं रहा था। सायरा ने शांत स्वर में बताया और बाद फोन रख दिया। 
 
देशप्रेम का जज्बा  
 
मैं दिलीप कुमार के बारे में सोचने लगा। इसमें बहस की गुंजाइश ही नहीं है कि दिलीप कुमार भारतीय फिल्म इंडस्ट्री के सबसे उम्दा एक्टर हैं। उनका जन्म पेशावर में हुआ। वे फलों के एक थोक व्यापारी के चौथे बेटे थे। उनका बचपन उतना खुशगवार नहीं था। वास्तव में उन्होंने पिता के साथ फलों की खरीद-बिक्री का काम किया था। आठ साल की उम्र में पिता से झगडा होने पर उन्होंने घर छोड दिया और पुणे की ब्रिटिश छावनी के कैंटीन में काम करने लगे। वहां ब्रिटिश सैनिकों के साथ घुल-मिल गए। वे उनके साथ फुटबाल खेलते थे। उनके साथ द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत की संभावना पर बातें करते थे। भारत छोडो आंदोलन के समय छोटे से अपराध के लिए उन्हें एक रात के लिए हवालात में रहना पडा। सुबह उन्होंने नाश्ता करने से इसलिए इनकार कर दिया था कि जेल में कहीं गांधी जी उपवास कर रहे थे। अगर उनकी जिंदगी के पन्ने पलट कर देखें तो पाएंगे कि देश के प्रति उनमें जन्मजात अनुराग था। एक बार उन्होंने बताया कि शुरू में हिंदी फिल्मों और अभिनय में उनकी रुचि नहीं थी। वे अंग्रेजी साहित्य पढना और अंग्रेजी फिल्में देखना पसंद करते थे। उनके परिचित मनोवैज्ञानिक डॉ. मसानी ने एक बार उनकी मुलाकात उस दौर की मशहूर हीरोइन देविका रानी से करवा दी। देविका को दिलीप कुमार उर्दू उच्चारण की वजह से पसंद आए। उन्होंने तुरंत उन्हें बांबे टाकीज में रख लिया। इसके साथ ही हिंदी फिल्मों से उनके लंबे और गरिमापूर्ण रोमांस की शुरुआत हुई।  </description>
	 	 <pubDate>2009-09-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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		<title>आज की बचत कल काम आती है: अनूप सोनी</title>
		<link>http://in.jagran.yahoo.com/sakhi/?edition=200908&amp;category=8</link>
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		कहते हैं न दादा न भैया। सबसे बडा रुपैया। आज के जमाने में पैसे के बिना कोई काम नहीं होता। जीवन भर व्यक्ति इसी के पीछे भागता रहता है। लेकिन पैसे कमाने, बचत व खर्च करने के मामले में सबका नजरिया अलग-अलग होता है। कुछ लोग रिश्तों की बलि चढाकर भी पैसा पाना चाहते हैं, तो कुछ पैसे को हाथ का मैल समझकर उडा देते हैं। सभी के जीवन में पैसे की अहमियत अलग-अलग है। जितने लोग उतने ही तरीके हैं पैसे को इस्तेमाल करने के। इस मामले में अभिनेता अनूप सोनी क्या सोचते हैं, जानिए उन्हीं की जुबानी। 
 
1. आपकी जिंदगी में पैसा क्या अहमियत रखता है? 
 
पैसा आपके स्टेटस को बढाता है। इसके बिना जिंदगी के सफर में आगे नहीं बढा जा सकता। लेकिन खुद का स्वास्थ्य पैसों से ज्यादा महत्वपूर्ण है। </description>
	 	 <pubDate>2009-08-01 05:30:04</pubDate>
	 	
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